आभिजात्य की बुनाई मणिपुर: जीआई टैग्ड मोइरांग फी और वांगखेई फी की पूरी गाइड

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मणिपुर के जीआई टैग टेक्सटाइल की पूरी गाइड। मोइरांग फी के मंदिर के मोटिफ और वांगखेई फी के जाल जैसी बारीक बुनाई का इतिहास और तकनीक जानें।

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भारत के उत्तर-पूर्व के रत्न मणिपुर केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि उसके समृद्ध हस्तशिल्प और बुनाई कला के लिए भी विश्व प्रसिद्ध है। मणिपुरी हस्तचालित करघे के हर धागे के तान में छिपा है एक गौरवशाली इतिहास। मणिपुरी मोइरांग फी (Moirang Phee) और वांगखेई फी (Wangkhei Phee)—ये दो टेक्सटाइल विरासत केवल कपड़े नहीं हैं, ये मणिपुर के शाही आभिजात्य और संस्कृति के प्रतीक हैं, जिन्हें भारत सरकार का जीआई टैग (GI Tag) प्राप्त है। आज Vunavya के इस विशेष मास्टर ब्लॉग में हम मणिपुर के इन २ सबसे आभिजात्यपूर्ण और बारीक टेक्सटाइल हेरिटेज के गहरे इतिहास और तकनीक को विस्तार से जानेंगे।

१: मोइरांग फी (Moirang Phee) — मंदिर के मोटिफ और विरासत का बॉर्डर

मणिपुर की लोककथाओं के साथ ओत-प्रोत रूप से जुड़ा है मोइरांग फी। यह मुख्य रूप से एक सूती या सिल्क की साड़ी या ओढ़नी है, जिसका मुख्य आकर्षण इसके बॉर्डर के डिज़ाइन में छिपा है। प्राचीन काल में मोइरांग फी मणिपुर के शाही परिधान का हिस्सा था और राजा वीर योद्धाओं को इसे उपहार के रूप में देते थे।

  • बुनाई और मोटिफ की विशेषता: मोइरांग फी को पहचानने का सबसे आसान तरीका इसके बॉर्डर का विशेष ज्यामितीय डिज़ाइन है, जो देखने में मंदिर के शिखर की तरह है। इसे स्थानीय भाषा में ‘मोइरांग लोइकोन’ (Moirang Loikon) या मंदिर का मोटिफ कहा जाता है। कपड़ा मुख्य रूप से बैकस्ट्रैप लूम या कमर में बंधे करघे पर बुना जाता है। बुनकर बहुत यत्न से इस मोटिफ को करघे के धागे के तान में उकेरते हैं, जो कपड़े को एक अनूठा पारंपरिक रूप देता है।

२: वांगखेई फी (Wangkhei Phee) — बारीक जाल जैसा आभिजात्य का स्पर्श

मणिपुर की बुनाई कला की सबसे अंतिम सूक्ष्मता और आभिजात्य का नाम है वांगखेई फी। यह एक बहुत बारीक और आभिजात्यपूर्ण हाथ से बुना हुआ सफेद सूती कपड़ा है, जो मणिपुरी नारी के लावण्य और सुंदरता का प्रतीक है।

  • बुनाई शैली की गहराई: वांगखेई फी पूरी तरह से सूती बारीक धागे से बहुत सघन रूप से कमर-करघे (Loin Loom) पर बुना जाता है। इस बुनाई शैली की सबसे बड़ी विशेषता इसका ‘फी-शापान’ (Phee-shapan) या जाल जैसा बुनाई है, जो कपड़े को बहुत पतला और बारीक रूप देता है। दूर से इस कपड़े को देखने पर लगता है जैसे यह मकड़ी के जाल से बना है।

निष्कर्ष

मणिपुर की ये २ टेक्सटाइल विरासत हमें सिखाती हैं कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर कैसे सदियों तक एक संस्कृति को जीवित रखा जा सकता है। इस अमूल्य पहाड़ी विरासत को वैश्विक मंच पर लाने के लिए Vunavya हमेशा गर्व के साथ काम कर रहा है।

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